९ वा राष्ट्रीय अधिवेशन, उज्जैन

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भारतीय किसान संघ का राष्ट्रीय आधिवेशन

4,5,6 फ़रवरी को उज्जैन में

स्वावलम्बी किसान सम्पन्न ग्राम समर्थ भारत के उदघोश के साथ भारतीय किसान संघ का 9वा राष्ट्रीय आधिवेशन धार्मिक महत्व के एतिहासिक नगर उज्जैन मे 4 फ़रवरी को प्रारम्भ हो रहा हे । 4,5व6 फ़रवरी तक आयोजित इस महाअधिवेशन मे 1 लाख किसान एवँ देशभर से 1500 हजार प्रतिनिधियो के शामिल होने की संभावना हे । इस अवसर पर देशभर के जलस्त्रोतो से लाए गए जल से काँची कामकोठी पिठाधीश्वर स्वामी जयेन्द्र सरस्वती भगवान महाकाल का जलाभिषेक करेंगे एवम लाखो किसानो को जल संचय का संकल्प दिलायेगे ।

देश के इतिहास मे यह अनुठा आयोजन हे जिसमे देश के 3 लाख ग्रामो से जल सँग्रहित कर जल - संरक्षण का सकल्प लिया जायेगा । राष्ट्रीय आधिवेशन के सफ़ल आयोजन के लिये उज्जैन के एतिहासिक कार्तिक मेला ग्राउंड पर चाक चोबंद व्यवस्थाए कि गयी हे। करिब 4 लाख स्क्वेयर फ़ुट पर विशाल पांडाल सजाया गया हे । किसान बंधुओ के ठहरने के लिये सर्व सुविधा युक्त 10 गांव बसाये गये हे । इस अवसर पर क्रुषि प्रदर्शनियों का भी आयोजन किया जायेगा ।

इस महाअधिवेशन के लिये भारतीय किसान संघ के द्वारा अभुतपुर्व तेयारिया कि गयी हे । 15 जनवरी से कुल 57 रथयात्राओ ने देश भर के 500 जिलो के करीब 2500 विकासखण्डो मे जाकर स्वावलम्बी किसान सम्पन्न ग्राम समर्थ भारत के उदघोश के साथ जल सग्रंहण एवम भगवान महाकाल के जलाभिषेक मे शामिल होने हेतु व्रहद अभियान चलाया । उज्जैन के एतिहासिक कार्तिक मेला ग्राउंड पर किसानो के भगवान, भगवान बलराम कि 16 फ़िट उँची विशाल प्रतिमा का निर्माण किया गया हे।

एतिहासिक नगरी उज्जैन मे 4,5,6 फ़रवरी को भारतीय किसान संघ के होने वाले राष्ट्रीय आधिवेशन पर देश – विदेश कि निगाहे टिकी हुई हे , यहा पर लिये गये संकल्पो से देश व किसानो कि आर्थिक नितियो पर खासा असर पडने कि संभावना हे ।

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“9th National Convention 4,5,6

February in Ujjain”

‘Swalambi Kisan, Sampann Gram, Samarth Bharat’ with the announcement of the slogan 9th National convention of Bhartiya Kisan Sangh” is going to start 4th February in historical city of religious importance, Ujjain. The convention will be held for 3 days i.e. 4,5 & 6 February, about 1 lakh farmer from Malwa region (Madhya Pradesh) and 15000 representative from all over India are expected to take part in this grand convention. On this occasion, Param Pujya Jagad Guru Kanchi Kamkothi Pithadhishwar Swami Jayendra Saraswati Ji Maharaj will offer Jalabhishek to Lord Mahakal with the water brought from different resources from all over India and lakhs of farmers will solemn pledge To Save Water. To Conserve Water. To Keep Clean Water.

In the history of our Country this is a unique and biggest event ever in which Water wil be collected from 3 lakh villages of different regions of Bharat (India) and take solemn pledge to conserve water. For the successful execution of this National convention all the arrangements have been made historical Kartik Mela ground about 4 lakh sq. ft big Pandal is decorated. For the same in order to provide accommodations to delegates. 10 villages have been made with adequate facilities.

For this grand event Bhartiya Kisan Sangh has made excellent preparation. In this connection since 15th January onwards almost 57 Rath-Yatras taken out throughout the Malwa region & Jal Yatra also Organised in about 500 districts and 2500 blocks with the slogan “Swalambi Kisan Sampann Gram, Samarth Bharat ” this is a unique events of water conservation and Jalabhishek of Lord Mahakal being in operation at a war footing. Lord of farmers Balram’s 16 ft. high staute has been erected at the venue.

This National Convention has become sole focus for the entire world community whatever pledge & promises taken here will cost impact on the economic policies of the country pertaining to the interest of the farmers.

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ध्वजारोहण सम्पन्न

The Sankalp Pooja of Sammelan

भारतीय किसान संघ का अखिल भारतीय अधिवेद्गान में दिनांक ४, ५, ६ फरवरी २०११ को कार्तिक मेला प्रांगण में होने जा रहा है। जिसमें देद्गा भर से १५ हजार किसान प्रतिनिधि भाग लेगें। इस अधिवेद्गान में पूरे देद्गाभर में जल, जन, जागरण यात्राएँ निकालकर देद्गा के ३ लाख गाँवों के जल स्त्रोतों से जल जल एकत्रित कर भगवान महाकालेद्गवर का जलाभिषेक कांची कमाकोटी पीठ के परम्‌ पूज्यगुरू शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज द्वारा किया जायगा। इस महाअधिवेद्गान का ध्वजारोहण कार्यक्रम कार्तिक मेला प्रांगण उज्जैन पर दोप १० बजे सम्पन्न होगा। कार्यक्रम के मुखय अतिथि भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रभाकर केलकर जी, श्री पारस जैन राज्य मंत्री म. प्र. शासन के मुखय आतिथ्य में सम्पन्न हुआ।

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१० लाख स्क्वेयर में होगा अधिवेशन

The Pendal being erected for the program

भारतीय किसान संघ का अखिल भारतीय अधिवेशन में दिनांक ४, ५, ६ फरवरी २०११ को कार्तिक मेला प्रांगण में सम्पन्न होने जा रहा है। जिसमें देशभर के ५ सौ जिलों के चार हजार विकासखण्डों के १५ हजार किसान प्रतिनिधि भाग लेगें। जिनके आवास, भोजन, सभा मण्डप, कृषि मेला, वी०आई०पी० कॉटेज, प्रेस कान्फ्रेस रूम आदि की व्यवस्थाओं के लेकर कार्तिक मेला प्रांगण राम बाग, दत्तात्रय अखाड़ा प्रागंण पर निर्माण कार्य युध्द स्तर पर किया जा रहा है। इसमें ४०-४० हजार स्क्वेयर फीट में १५००-१५०० किसान प्रति गांव के हिसाब से १० गांव बनाये जा रहे है। इसमें सर्व सुविधा युक्त आवास, भोजन पण्डाल, स्नानघर, शौचालय, आदि व्यवस्थाओं का निर्माण किया जा रहा है साथ ही अधिवेशन में ६० हजार स्क्वेयर फीट में सभा मण्डप, ४० हजार फीट में कृषि मेला (प्रर्दशनी) प्रांगण का निर्माण किया जा रहा है। साथ ही भगवान बलराम जी की १६ फीट की विद्गााल प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा है। इसमें सर्वसुविधा युक्त ४-४ बेड के ८ वी०आई०पी० स्वीस कॉटेज का निर्माण किया जा रहा है। पार्किंग के लिये ३ लाख स्क्वेयर फीट का टीन वॉल का प्रांगण बनाया जा रहा है ।

The Statue being erected for the Sammelan

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भारतीय किसान संघ
वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन
माघ शुक्ल प्रथमा, द्वितीया, तृतीया - युगाब्द ५०१२ वि.सं. २०६७
दिनांक ४,५,६ फरवरी २०११
उज्जैन (म.प्र.)
प्रस्ताव क्र. १

सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था राष्ट्र के प्रगति का संकेत है।

अपने देश के विकास की रीढ़ शादियों से पर्यावरण युक्त सिंचित खेती थी। इसी के कारण अपना राष्ट्र धनी,सुसभ्य, सुसंस्कृत तथा सुशिक्षित बना था। तबसे हम जिन्दगी जीने के प्रत्येक क्षैत्र में शिखर पर थे। इतिहास साक्षी है कि लगभग ४५०० ई.पू. सिन्धु सभ्यता के समय में भारत में सिंचाई की योग्य प्रक्रिया विकसित हो गयी थी। सिंचाई व्यवस्था के तंत्र के आधार पर ही सिन्धु घाटी सभ्यता में नगरों में जल निकास की व्यवस्था देखी गयी है। भारत में तबसे अत्याधुनिक सिंचन एवं जल भण्डारण की व्यवस्था थी जैसे गिरिनार का कृतिम बाध (३००० ई.पू.) तथा सिरिका की नहर सिंचन व्यवस्था (२५०० ई.पू.)। पुष्करिणी के नाम से सिन्धु सभ्यता के समय प्रत्येक ग्राम में तालाब होते थे जिसका चिन्ह आज भी अवशेष है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में सम्पन्न राष्ट्र के लिए बांध एवं पुल बनाने की बात का उल्लेख किया है।

भारत के लिए कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था कोई नई बात नहीं है। आज हम बढ़ती मंहगाई, खाद्यान्न सुरक्षा, बढ़ती बेरोजगारी तथा पर्यावरण असंतुलन के लिए चिंतित है। विश्व की महाशक्ति बनने की दौड़ में हम खड़े है। लेकिन हम अभी तक केवल ३७% ही सिंचाई की व्यवस्था कर सके है। हमें नहीं समझ में आ रहा है कि भूखे बेरोजगार लोगो के बल पर भारत कैसे शक्तिशाली राष्ट्र बन सकेगा।

भारत में कुल भौगोलिक क्षैत्र ३२८.७३ मी. हेक्ट. भूमि है जिसमें ४७% (१४२ मी.हेक्ट.) कृषि योग्य, २३ जंगल, ७% गैर कृषि, कार्य के लिए और २३% अनुपयोगी भूमि है। १४२ मी. हेक्ट. भूमि से ही ६५% लोगो को कृषि के माध्यम से रोजगार तथा देश को २२० मी. टन अनाज प्राप्त होता है। कुल कृषि योग्य भूमि का केवल ३७% ही सिंचित है जो ५५% खाद्यान्न पैदा करता है तथा ६३% असिंचित भूमि से ४५% खाद्यान्न पैदा होता है इससे सिद्ध होता है कि असिंचित जमीन की तुलना में सिंचित जमीन से लगभग दो गुना पैदावार होती है।

भारत की बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए निकट भविष्य में ६०% अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता पड़ने वाली हैं हम केवल बीज सुधार करके इस लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकते, हमें सिंचाई की समुचित व्यवस्था करनी ही होगी। आधुनिक औद्योगिक एवं आर्थिक बाजार, बढ़ती बेरोजगारी को रोजगार नहीं दे सकता यह निश्चित है। सिंचित कृषि ही इसका एकमात्र उत्तर है ऐसा देश के नेता, प्रशासक एवं योजना कर्ताओं को समझना पड़ेगा।

पिछले दशकां से कृषि का विकास दर क्रमशः नीचे गिर रहा है। १९८० से ९५ तक ३.३% तथा १९९५ से २००३ तक २% और वर्तमान में २% से नीचे हो गया है। इसी प्रकार प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता जो १९९४-१९९६ मे थी ८% वर्तमान में घट चुका है। योजना कर्ताओं के अनुसार २०१५ तक देश को कम से कम २४० मी.ट. खाद्यान्न की आवश्यकता होगी लेकिन घटती कृषि योग्य भूमि के कारण हम इस लक्ष्य को केवल सिंचाई की सुविधा बढ़ाकर ही प्राप्त कर सकते है।

सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है जल का स्त्रोत सीमित है तथा जल का वितरण अभी अव्यवहारिक एवं असन्तुलित है। विभिन्न स्त्रोंतो से ४२० मी. हेमी. जल प्रकृति द्वारा प्राप्त होता है। जिसमें १८० मी. हेमी. नदियों द्वारा वह जाता है तथा ६७ मी. हेमी. जमीन के अन्दर चला जाता है। इसमें से नदियों द्वारा बहते पानी का ११५ मी. हेमी. और जमीन के नीचे का २६.५ मी. हैमी. जल का हम उपयोग कर सकते है। इसी सीमित जल पर जीवजगत, कृषि एवं उद्योग आधारित है। कम परिमाण क्यों ही नहो लेकिन जीवन जीने के हेतु घरेलु उपयोग के लिए जल अनिवार्य है। वर्तमान खाद्यान्न की विकट परिस्थिति से निपटने के लिए वल्ड रिसोर्स इन्सटीट्यूट के सन् २००० के रिपोर्ट को माने तो वर्तमान में उपलब्ध जल के ९२% का कृषि के सिंचाई के लिए उपयोग करना ही पड़ेगा।

१९८७ में भारत का पहल जल नीतिबना जिसमें, जल वितरण, भू-जल का संरक्षण, वर्षा जल संग्रह की कुछ नीतियाँ तय थी। जिस पर २००२ में व्यापक चर्चा हुयी जो अभी भी जारी है। इसके अनुसार प्रत्येक राज्य को पीने के लिए पानी, सिंचाई, जल विद्युत, पर्यावरण, कृषि आधारित उद्योग और अकृषि उद्योग के क्रम में प्राथमिकता देकर जल वितरण नीति बनाने का आग्रह किया जा रहा है। भारतीय किसान संघ का मानना है कि उपरोक्त विषयों को ध्यान में रखते हुए शीघ्र-अतिशीघ्र जल नीति बनाने एवं उसके क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

उपरोक्त सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर भारतीय किसान संघ का ९ वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन केन्द्र सरकार एवं राज्यों की सरकारों से आग्रह करता है कि सिंचित कृषि के समर्थन में अपनी सोच बदलें। इसी से ही खाद्यान्न सुरक्षा, बेरोजगारी, पर्यावरण असंतुलन तथा भू-जल संरक्षण की समस्या का समाधान हो सकता है।

अतः भारतीय किसान संघ के 9वें राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित इस प्रस्ताव के माध्यम से मांग करता है कि -

(1) पीने के पानी के बाद सिंचाई के लिए पानी प्राथमिकता के आधार पर रखा जाय।

(2) किसानों के उपज का न्यूनतम सर्वथन मूल्य पूरे देश के लिए एक घोषित होता है परन्तु अलग-अलग प्रदेशों में सिंचाई के प्रकार एवं दरों में विभिन्नता है जिसमें एक रूपता लाई जाय।

(3) अनुभव के आधार पर बड़ी सिंचाई योजनायें अपेक्षा के अनुसार कार्य नहीं कर रही है इनके स्थान पर अति लघु सिंचाई योजनाओं का प्राथमिकता के आधार पर निर्माण किया जाय।

(4) सांसद निधि एवं विधायक निधि का अधिक से अधिक धनराशि सिंचाई व्यवस्था निर्माण में खर्च हो इसके लिए कानून में परिवर्तन किया जाय।

(5) जल ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य निधि है, भारतीय जन इसे श्रद्धापूर्वक ईश्वर की कृपा मानता है। जल एवं जल स्त्रोंत का व्यवसायिकरण न किया जाय।

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प्रस्ताव क्र. २

कृषि उपज का लागत के आधार पर लाभकरी मूल्य

अपने देश में सन् १९७७ से २००८ के बीच करीब दो लाख किसानों ने बढते कर्ज के कारण होने वाले अपमान से बचने के लिए अपनी जान देने का आत्मघाती कदम उठाया ओर यह क्रम आज भी जारी है। रसायनिक खादों, बीजों एवं खेती के काम आने वाले अन्य समानों के मूल्यों में आई तेजी किसानों को कर्ज के जाल में फसाकर उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर रही है। आज देश का कृषक समाज अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है ओर देश खाद्यान संकट से जूझ रहा है। खाद्यान में आत्मनिर्भर किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता के लिए बुनियादी रूप से आवश्यक है। खाद्यान सुरक्षा के लिए किसानों को उनके उपज का लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य देकर उन्हें उत्पादन लगभग दूना करने की के लिए प्रोत्साहित करना आज समय की मांग है।

अमेरिका एवं यूरोप में किसानो को विभिन्न मदों में भारी प्रत्यक्ष सहायता देकर वहां की सरकारें किसानों को घाटे से उबारती है। उदाहरण के लिए यूरोप मे किसानो को ४००० रूपये प्रति हेक्टेयर प्रत्यक्ष अनुदान मिल रहा है, यह राशि भारत के किसानों की औसत आय से लगभग दो गुनी है। अमेरिका ने १९९५ से २००९ के मध्य करीब १२५००००/- (बारह लाख पचास हजार करोड़) रूपये का कृषि अनुदान अपने किसानों को दिया है, जिससे किसानों को न केवल सीधी आर्थिक सहायता प्राप्त हुयी बल्कि उन्होने प्रतिचक्र भुगतान ओर बाजा़र घाटा भुगतान जैसे लाभ भी प्राप्त किये।

आज कृषि वैज्ञानिक एवं कार्पोरेट जगत के लोग किसानों को आमदनी बढ़ाने के लिए उन्हें पैदावार बढ़ाने की सलाह देते है तो समझ में नहीं आता है कि पैदावार बढाने से उनकी आमदनी कैसे बढ़ जायेगी। जबकी उपज बढ़ाने के लिए किसानों को उपज से प्राप्त आय की तुलना में कई गुना अधिक लागत लगानी पड़ती है। किसान को उपज का लाभकारी मूल्य प्राप्त हो इसके लिए एक ओर लागत कम करने की योजना को कार्यरूप देने की आवश्यकता है तथा दूसरी ओर उपज बढाने का इस प्रकार का तरीका अपनाना होगा कि उपज भी बढ़ जाये एवं उपज प्रदूषित एवं जहरीला न हो। उसके लिए सरकार को किसानों को उनके जोत के अनुपात में प्रत्यक्ष सहायता करनी होगी, जिससे किसान बिना किसी दबाव के उत्तम खद्यान अधिक मात्रा में पैदा कर सके।

विगत ४५ वर्षो से भारत सरकार द्वारा कुछ प्रमुख कृषि उत्पाद के मूल्य निश्चित किये जाते है, इसका दायरा बढ़ाकर सम्पूर्ण कृषि उत्पाद के मूल्य(लागत के आधार पर लाभकारी) निश्चित करने की नीति अपनानी चाहिए। यह बहुत हास्यास्पद है कि जिन जिन्सो का मूल्य सरकार घोषित करती है उस मूल्य पर उनका कोई खरीददार नहीं मिलता है। किसान घोषित मूल्य से भी कम कीमत पर जिन्सो को बेचने को मजबूर होता है। तथा सरकार एवं सरकारी एजेंसियाँ भी विचैलियों के माध्यम से खरीद करके किसानों को ठगती है। किसानों का उपज घोषित लाभकारी मूल्य पर खरीदा जाय ऐसी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। भारतीय किसान संघ का मानना है कि सरकार एक रेगुलेटरी अथोर्टी के रूप में अहम भूमिका का निर्वाह कर सकती है।

कृषि उत्पादों का मूल्य निश्चित करने समय सरकारीतंत्र उन मानकों की अनदेखी करते है जिनके आधार पर लाभकारी मूल्य निश्चित किया जा सकता है। कृषि उपज का लाभकारी मूल्य निर्धारित करते समय पूंजी के रूप में भूमि के मूल्य का ब्याज या उसका किराया, भूमि के तैयारी का खर्च, अन्य संसाधन का मूल्य (इनपुट्स), सिंचाई खर्च, फसल तैयार करने में लगे हुए अन्य कार्य जैसे निराइर, गुड़ाई, कटाई, मड़ाई, आदि का खर्च, भण्डारण एवं यातायात खर्च, भण्डारण पर कम से कम २% हानि, मण्डी खर्च, क्रियाशील पूँजी पर १५% ब्याज तथा सम्पूर्ण खर्च पर २०%, प्राकृतिक आपदा से क्षति आदि प्रमुख बिन्दुओं सहित अन्य आवश्यक बिन्दुओं को जोड़ कर कम से कम १५% लाभांष को जोड़ते हुए उपज का मूल्य निर्धारित करना चाहिए।

भारतीय किसान संघ की यह मान्यता है कि देश के प्रत्येक नागरिक को सस्ता एवं उत्तम खाद्यान तथा किसान को लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य मिलना ही चाहिए। अनुभव में यह है कि किसान को लाभकारी मूल्य नहीं मिलता तथा उपभोक्ता को बाजार में मंहगे दामों में खाद्यान खरीदना पड़ता है। उदाहरण के लिए इस वर्ष जो प्याज खुले बाजार में ५० से ६० रूपये किलो तथा टमाटर २० से ३० किलो का बिका है वह किसानो से क्रमशः ५ से ६ तथा २ से ३ रूपया किलों खरीदा गया है। यही स्थिति प्रत्येक फसल के साथ समय-समय पर होती है। देश में खुली लूट मची है इसे कोई नियंत्रित करने वाला दिखाई नहीं दे रहा है। भारतीय किसान संध का निश्चित मत है कि सरकार को यह व्यवस्था निश्चित करना चाहिए कि कृषि उपज उपभोक्ताओं तक पहुँचते-पहुँचते किसानो को मिले मूल्य से ड्योढ़े (१) से अधिक मूल्य पर न बिके।

अतः भारतीय किसान संघ के ९ वें राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित इस प्रस्ताव के माध्यम से राष्ट्रहित में किसानों के आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने, कृषि में रोजगार सृजित करने तथा कृषि कार्य से पलायन रोकने के लिए भारत सरकार से मांग करती है कि भारत सरकार राष्ट्रीय कृषि नीति, जल वितरण नीति, अनुदान नीति, कृषि उत्पाद विपणन नीति, कृषि उपज मूल्य निर्धारण नीति तथा अन्य संबंधित नीतियों पर पुर्नविचार करे ओर कृषि उपज का लागत के आधार पर मूल्य निकालने का सही एवं वैज्ञानिक फार्मूला स्थापित करे तथा लागत मूल्य पर प्राकृतिक आपदा से हानि एवं कम से कम १५% लाभांश जोड़कर लाभकरी मूल्य निश्चित करें।

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