भारतीय किसान संघ के ९ वे राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित प्रस्ताव

Filed under: Resolutions — Office @ 2:08 am
भारतीय किसान संघ
वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन
माघ शुक्ल प्रथमा, द्वितीया, तृतीया - युगाब्द ५०१२ वि.सं. २०६७
दिनांक ४,५,६ फरवरी २०११
उज्जैन (म.प्र.)
प्रस्ताव क्र. १

सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था राष्ट्र के प्रगति का संकेत है।

अपने देश के विकास की रीढ़ शादियों से पर्यावरण युक्त सिंचित खेती थी। इसी के कारण अपना राष्ट्र धनी,सुसभ्य, सुसंस्कृत तथा सुशिक्षित बना था। तबसे हम जिन्दगी जीने के प्रत्येक क्षैत्र में शिखर पर थे। इतिहास साक्षी है कि लगभग ४५०० ई.पू. सिन्धु सभ्यता के समय में भारत में सिंचाई की योग्य प्रक्रिया विकसित हो गयी थी। सिंचाई व्यवस्था के तंत्र के आधार पर ही सिन्धु घाटी सभ्यता में नगरों में जल निकास की व्यवस्था देखी गयी है। भारत में तबसे अत्याधुनिक सिंचन एवं जल भण्डारण की व्यवस्था थी जैसे गिरिनार का कृतिम बाध (३००० ई.पू.) तथा सिरिका की नहर सिंचन व्यवस्था (२५०० ई.पू.)। पुष्करिणी के नाम से सिन्धु सभ्यता के समय प्रत्येक ग्राम में तालाब होते थे जिसका चिन्ह आज भी अवशेष है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में सम्पन्न राष्ट्र के लिए बांध एवं पुल बनाने की बात का उल्लेख किया है।

भारत के लिए कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था कोई नई बात नहीं है। आज हम बढ़ती मंहगाई, खाद्यान्न सुरक्षा, बढ़ती बेरोजगारी तथा पर्यावरण असंतुलन के लिए चिंतित है। विश्व की महाशक्ति बनने की दौड़ में हम खड़े है। लेकिन हम अभी तक केवल ३७% ही सिंचाई की व्यवस्था कर सके है। हमें नहीं समझ में आ रहा है कि भूखे बेरोजगार लोगो के बल पर भारत कैसे शक्तिशाली राष्ट्र बन सकेगा।

भारत में कुल भौगोलिक क्षैत्र ३२८.७३ मी. हेक्ट. भूमि है जिसमें ४७% (१४२ मी.हेक्ट.) कृषि योग्य, २३ जंगल, ७% गैर कृषि, कार्य के लिए और २३% अनुपयोगी भूमि है। १४२ मी. हेक्ट. भूमि से ही ६५% लोगो को कृषि के माध्यम से रोजगार तथा देश को २२० मी. टन अनाज प्राप्त होता है। कुल कृषि योग्य भूमि का केवल ३७% ही सिंचित है जो ५५% खाद्यान्न पैदा करता है तथा ६३% असिंचित भूमि से ४५% खाद्यान्न पैदा होता है इससे सिद्ध होता है कि असिंचित जमीन की तुलना में सिंचित जमीन से लगभग दो गुना पैदावार होती है।

भारत की बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए निकट भविष्य में ६०% अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता पड़ने वाली हैं हम केवल बीज सुधार करके इस लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकते, हमें सिंचाई की समुचित व्यवस्था करनी ही होगी। आधुनिक औद्योगिक एवं आर्थिक बाजार, बढ़ती बेरोजगारी को रोजगार नहीं दे सकता यह निश्चित है। सिंचित कृषि ही इसका एकमात्र उत्तर है ऐसा देश के नेता, प्रशासक एवं योजना कर्ताओं को समझना पड़ेगा।

पिछले दशकां से कृषि का विकास दर क्रमशः नीचे गिर रहा है। १९८० से ९५ तक ३.३% तथा १९९५ से २००३ तक २% और वर्तमान में २% से नीचे हो गया है। इसी प्रकार प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता जो १९९४-१९९६ मे थी ८% वर्तमान में घट चुका है। योजना कर्ताओं के अनुसार २०१५ तक देश को कम से कम २४० मी.ट. खाद्यान्न की आवश्यकता होगी लेकिन घटती कृषि योग्य भूमि के कारण हम इस लक्ष्य को केवल सिंचाई की सुविधा बढ़ाकर ही प्राप्त कर सकते है।

सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है जल का स्त्रोत सीमित है तथा जल का वितरण अभी अव्यवहारिक एवं असन्तुलित है। विभिन्न स्त्रोंतो से ४२० मी. हेमी. जल प्रकृति द्वारा प्राप्त होता है। जिसमें १८० मी. हेमी. नदियों द्वारा वह जाता है तथा ६७ मी. हेमी. जमीन के अन्दर चला जाता है। इसमें से नदियों द्वारा बहते पानी का ११५ मी. हेमी. और जमीन के नीचे का २६.५ मी. हैमी. जल का हम उपयोग कर सकते है। इसी सीमित जल पर जीवजगत, कृषि एवं उद्योग आधारित है। कम परिमाण क्यों ही नहो लेकिन जीवन जीने के हेतु घरेलु उपयोग के लिए जल अनिवार्य है। वर्तमान खाद्यान्न की विकट परिस्थिति से निपटने के लिए वल्ड रिसोर्स इन्सटीट्यूट के सन् २००० के रिपोर्ट को माने तो वर्तमान में उपलब्ध जल के ९२% का कृषि के सिंचाई के लिए उपयोग करना ही पड़ेगा।

१९८७ में भारत का पहल जल नीतिबना जिसमें, जल वितरण, भू-जल का संरक्षण, वर्षा जल संग्रह की कुछ नीतियाँ तय थी। जिस पर २००२ में व्यापक चर्चा हुयी जो अभी भी जारी है। इसके अनुसार प्रत्येक राज्य को पीने के लिए पानी, सिंचाई, जल विद्युत, पर्यावरण, कृषि आधारित उद्योग और अकृषि उद्योग के क्रम में प्राथमिकता देकर जल वितरण नीति बनाने का आग्रह किया जा रहा है। भारतीय किसान संघ का मानना है कि उपरोक्त विषयों को ध्यान में रखते हुए शीघ्र-अतिशीघ्र जल नीति बनाने एवं उसके क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

उपरोक्त सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर भारतीय किसान संघ का ९ वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन केन्द्र सरकार एवं राज्यों की सरकारों से आग्रह करता है कि सिंचित कृषि के समर्थन में अपनी सोच बदलें। इसी से ही खाद्यान्न सुरक्षा, बेरोजगारी, पर्यावरण असंतुलन तथा भू-जल संरक्षण की समस्या का समाधान हो सकता है।

अतः भारतीय किसान संघ के 9वें राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित इस प्रस्ताव के माध्यम से मांग करता है कि -

(1) पीने के पानी के बाद सिंचाई के लिए पानी प्राथमिकता के आधार पर रखा जाय।

(2) किसानों के उपज का न्यूनतम सर्वथन मूल्य पूरे देश के लिए एक घोषित होता है परन्तु अलग-अलग प्रदेशों में सिंचाई के प्रकार एवं दरों में विभिन्नता है जिसमें एक रूपता लाई जाय।

(3) अनुभव के आधार पर बड़ी सिंचाई योजनायें अपेक्षा के अनुसार कार्य नहीं कर रही है इनके स्थान पर अति लघु सिंचाई योजनाओं का प्राथमिकता के आधार पर निर्माण किया जाय।

(4) सांसद निधि एवं विधायक निधि का अधिक से अधिक धनराशि सिंचाई व्यवस्था निर्माण में खर्च हो इसके लिए कानून में परिवर्तन किया जाय।

(5) जल ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य निधि है, भारतीय जन इसे श्रद्धापूर्वक ईश्वर की कृपा मानता है। जल एवं जल स्त्रोंत का व्यवसायिकरण न किया जाय।

——————————————————————————————————————————————————————————-

प्रस्ताव क्र. २

कृषि उपज का लागत के आधार पर लाभकरी मूल्य

अपने देश में सन् १९७७ से २००८ के बीच करीब दो लाख किसानों ने बढते कर्ज के कारण होने वाले अपमान से बचने के लिए अपनी जान देने का आत्मघाती कदम उठाया ओर यह क्रम आज भी जारी है। रसायनिक खादों, बीजों एवं खेती के काम आने वाले अन्य समानों के मूल्यों में आई तेजी किसानों को कर्ज के जाल में फसाकर उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर रही है। आज देश का कृषक समाज अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है ओर देश खाद्यान संकट से जूझ रहा है। खाद्यान में आत्मनिर्भर किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता के लिए बुनियादी रूप से आवश्यक है। खाद्यान सुरक्षा के लिए किसानों को उनके उपज का लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य देकर उन्हें उत्पादन लगभग दूना करने की के लिए प्रोत्साहित करना आज समय की मांग है।

अमेरिका एवं यूरोप में किसानो को विभिन्न मदों में भारी प्रत्यक्ष सहायता देकर वहां की सरकारें किसानों को घाटे से उबारती है। उदाहरण के लिए यूरोप मे किसानो को ४००० रूपये प्रति हेक्टेयर प्रत्यक्ष अनुदान मिल रहा है, यह राशि भारत के किसानों की औसत आय से लगभग दो गुनी है। अमेरिका ने १९९५ से २००९ के मध्य करीब १२५००००/- (बारह लाख पचास हजार करोड़) रूपये का कृषि अनुदान अपने किसानों को दिया है, जिससे किसानों को न केवल सीधी आर्थिक सहायता प्राप्त हुयी बल्कि उन्होने प्रतिचक्र भुगतान ओर बाजा़र घाटा भुगतान जैसे लाभ भी प्राप्त किये।

आज कृषि वैज्ञानिक एवं कार्पोरेट जगत के लोग किसानों को आमदनी बढ़ाने के लिए उन्हें पैदावार बढ़ाने की सलाह देते है तो समझ में नहीं आता है कि पैदावार बढाने से उनकी आमदनी कैसे बढ़ जायेगी। जबकी उपज बढ़ाने के लिए किसानों को उपज से प्राप्त आय की तुलना में कई गुना अधिक लागत लगानी पड़ती है। किसान को उपज का लाभकारी मूल्य प्राप्त हो इसके लिए एक ओर लागत कम करने की योजना को कार्यरूप देने की आवश्यकता है तथा दूसरी ओर उपज बढाने का इस प्रकार का तरीका अपनाना होगा कि उपज भी बढ़ जाये एवं उपज प्रदूषित एवं जहरीला न हो। उसके लिए सरकार को किसानों को उनके जोत के अनुपात में प्रत्यक्ष सहायता करनी होगी, जिससे किसान बिना किसी दबाव के उत्तम खद्यान अधिक मात्रा में पैदा कर सके।

विगत ४५ वर्षो से भारत सरकार द्वारा कुछ प्रमुख कृषि उत्पाद के मूल्य निश्चित किये जाते है, इसका दायरा बढ़ाकर सम्पूर्ण कृषि उत्पाद के मूल्य(लागत के आधार पर लाभकारी) निश्चित करने की नीति अपनानी चाहिए। यह बहुत हास्यास्पद है कि जिन जिन्सो का मूल्य सरकार घोषित करती है उस मूल्य पर उनका कोई खरीददार नहीं मिलता है। किसान घोषित मूल्य से भी कम कीमत पर जिन्सो को बेचने को मजबूर होता है। तथा सरकार एवं सरकारी एजेंसियाँ भी विचैलियों के माध्यम से खरीद करके किसानों को ठगती है। किसानों का उपज घोषित लाभकारी मूल्य पर खरीदा जाय ऐसी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। भारतीय किसान संघ का मानना है कि सरकार एक रेगुलेटरी अथोर्टी के रूप में अहम भूमिका का निर्वाह कर सकती है।

कृषि उत्पादों का मूल्य निश्चित करने समय सरकारीतंत्र उन मानकों की अनदेखी करते है जिनके आधार पर लाभकारी मूल्य निश्चित किया जा सकता है। कृषि उपज का लाभकारी मूल्य निर्धारित करते समय पूंजी के रूप में भूमि के मूल्य का ब्याज या उसका किराया, भूमि के तैयारी का खर्च, अन्य संसाधन का मूल्य (इनपुट्स), सिंचाई खर्च, फसल तैयार करने में लगे हुए अन्य कार्य जैसे निराइर, गुड़ाई, कटाई, मड़ाई, आदि का खर्च, भण्डारण एवं यातायात खर्च, भण्डारण पर कम से कम २% हानि, मण्डी खर्च, क्रियाशील पूँजी पर १५% ब्याज तथा सम्पूर्ण खर्च पर २०%, प्राकृतिक आपदा से क्षति आदि प्रमुख बिन्दुओं सहित अन्य आवश्यक बिन्दुओं को जोड़ कर कम से कम १५% लाभांष को जोड़ते हुए उपज का मूल्य निर्धारित करना चाहिए।

भारतीय किसान संघ की यह मान्यता है कि देश के प्रत्येक नागरिक को सस्ता एवं उत्तम खाद्यान तथा किसान को लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य मिलना ही चाहिए। अनुभव में यह है कि किसान को लाभकारी मूल्य नहीं मिलता तथा उपभोक्ता को बाजार में मंहगे दामों में खाद्यान खरीदना पड़ता है। उदाहरण के लिए इस वर्ष जो प्याज खुले बाजार में ५० से ६० रूपये किलो तथा टमाटर २० से ३० किलो का बिका है वह किसानो से क्रमशः ५ से ६ तथा २ से ३ रूपया किलों खरीदा गया है। यही स्थिति प्रत्येक फसल के साथ समय-समय पर होती है। देश में खुली लूट मची है इसे कोई नियंत्रित करने वाला दिखाई नहीं दे रहा है। भारतीय किसान संध का निश्चित मत है कि सरकार को यह व्यवस्था निश्चित करना चाहिए कि कृषि उपज उपभोक्ताओं तक पहुँचते-पहुँचते किसानो को मिले मूल्य से ड्योढ़े (१) से अधिक मूल्य पर न बिके।

अतः भारतीय किसान संघ के ९ वें राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित इस प्रस्ताव के माध्यम से राष्ट्रहित में किसानों के आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने, कृषि में रोजगार सृजित करने तथा कृषि कार्य से पलायन रोकने के लिए भारत सरकार से मांग करती है कि भारत सरकार राष्ट्रीय कृषि नीति, जल वितरण नीति, अनुदान नीति, कृषि उत्पाद विपणन नीति, कृषि उपज मूल्य निर्धारण नीति तथा अन्य संबंधित नीतियों पर पुर्नविचार करे ओर कृषि उपज का लागत के आधार पर मूल्य निकालने का सही एवं वैज्ञानिक फार्मूला स्थापित करे तथा लागत मूल्य पर प्राकृतिक आपदा से हानि एवं कम से कम १५% लाभांश जोड़कर लाभकरी मूल्य निश्चित करें।

बायोटेक्नोलाजी रेगुलेटरी अथारिटी बिल विरोधी प्रस्ताव

Filed under: Resolutions — Office @ 6:43 am

दिनांक १८ जुलाई २०१०

अखिल भारतीय प्रबंध समिति की परभणी बैठक में पारित प्रस्ताव

भारत सरकार लोकतंत्र विरोधी प्रस्तावित बायोटेक्नोलाजी रेगुलेटरी अथारिटी बिल (BRAI) वापस ले तथा इसके स्थान पर बायोटेक्नोलाजी सेफ्टी अथारिटी बिल लाये-

भारत सरकार जेनेटिक इंजिनिरिंग अप्रुवल कमेटी के स्थान पर इस बिल के माध्यम से तीन सदस्यीय रेगुलेटरी बाडी स्थापित करना चाहती है जो सभी प्रकार के जेनेटिक उत्पाद के व्यवसायिक उत्पादन की त्वरित अनुमति दे। त्वरित अनुमति के लिए एकल खिड़की व्यवस्था इसलिए की जा रही है कि पिछले वर्ष के अंतिम चरण में देशभर में बीटी वैगन का जो विरोध सरकार को झेलना पड़ा उससे सदा के लिए छुट्टी मिल जाये और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा बड़े औद्योगिक घरानों का हित हो, इसीलिए प्रस्तावित बिल में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और बड़े औद्योगिक घरानों को सूचना छिपाने, अनुसंधान के नतीजे में छेड़-छाड़ करने और भोले-भाले नागरिकों को नुकसानदायक उत्पाद पेश करने से रोकने का कोई प्रावधान नहीं है। न ही किसी हादसे के लिए कंपनी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। स्पष्ट है कि यह बिल बड़ी कृषि-उद्योग कंपनियों के हित में और उनका मुनाफा बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है। यह बिल प्रकृति, मनुष्य समाज, जैवविविधता, पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि एवं कृषक विरोधी है। इस बिल में व्यवस्था है-

1. इस बिल के सेक्सन 61, 62 में कहा गया है कि जी एम उत्पादों के कारण कोई हादसा होने पर कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी।

2. इसके सेक्सन 63 के चैप्टर 13 में लिखा है, ‘जो व्यक्ति बिना साक्ष्यों या वैज्ञानिक रेकार्ड के जनता को उत्पादों की सुरक्षा के बारे में गुमराह करेगा उसे कम से कम 6 माह और अधिक से अधिक एक वर्ष की कैद या दो लाख रुपये तक अर्थदण्ड या दोनों सजायें सुनाई जा सकती हैं।

3. इस बिल के आर्टिकल 27 (1) के अनुसार जीएम उत्पादों के शोध, अनुमोदन और विज्ञान के विषय में जानकारी प्राप्त करना भी सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर किया गया है।

4. इसका सेक्सन 81 सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

5. इस बिल में व्यवस्था है कि बी. आर. आई अपनी खुद का पुनर्विचार संबंधी ट्रिब्यूनल गठित करेगा जो बायो प्रौद्योगिकी संबंधी किसी भी मामले की सुनवाई करेगा किसी भी विवाद की स्थिति में याचिकाकर्ता केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही अपील कर सकता है।

विधेयक के उपरोक्त नियमों से स्पष्ट है कि यह विधेयक मानवाधिकार का हनन करने वाला है।

कृषि एवं स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। चोर दरवाजे से कृषि एवं स्वास्थ्य का अधिकार यह राज्यों से छिनने वाला है। इसमें राज्यों का एक भी प्रतिनिधि रखने की व्यवस्था नहीं है। यह अपने सेक्सन (2) के द्वारा राज्यों के अधिकार का हनन कर रहा है। यह विधेयक राज्यों के संवैधानिक अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए देश के संघीय व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने वाला है।

अतः भारतीय किसान संघ की यह- अखिल भारतीय प्रबन्ध समिति देश के सभी सांसदों, राज्य सरकारों, बुद्धिजीवियों एवं जनता से निवेदन करती है कि इस विधेयक का संसद के अन्दर एवं बाहर कड़ा विरोध करें। प्रबन्ध समिति भारत सरकार से मांग करती है कि लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं नागरिक अधिकार विरोधी यह बिल वापस ले तथा इसके स्थान पर बायोटेक्नोलोजी सेफ्टी अथार्टी बिल संसद में पेश करके पारित करायें।

यदि दुर्भाग्य से बी. आर. ए. आई. बिल संसद में परित होता है तो इसके विरोध में जो जनआन्दोलन प्रस्फुटित होगा तो उसके लिए भारत सरकार उत्तरदायी होगी। भारतीय किसान संघ देश की जनता को साथ लेकर इस विधेयक के विरोध में संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी हद तक आन्दोलन करेगा।

Resolution : Don’t legalise food colonialism and slavery of seed sovereignty through BRAI

Filed under: Resolutions — Office @ 11:06 pm

Resolution passed in Prabandh Samiti meeting at Parbhani

18 July 2010

Don’t legalise food colonialism and slavery of seed sovereignty through BRAI.

Government of BHARAT is now with a bill in the form of the Biotechnology Regulatory Authority of India (BRAI)Bill, 2009.Government wants to set up BRAI, in place of the Genetic Engineering Approvals Committee (GEAC), a three-member regulatory body that will act as single-window clearing house for all GM [Genetically Modified] crops and their commercial applications.

With the processing of such applications as its primary mandate, the Bill is scheduled to be introduced and passed in Parliament this year. Government is in quick haste to pass the bill, particularly after the compelled moratorium on BT brinjal early this year. Introduction of BT brinjal faced stiff opposition from all quarters; from farming community to scientists, from intellectuals to health advisers, from social workers to religious leaders, from economists to environmentalists, from political outfits to almost all brinjal growing state governments.

Still, why UPA government at centre wants a legal pass for this anti nature, anti social, anti bio diversity, anti ecology, anti farmer, pro-health disaster, and pro MNC bill [BRAI] anyway, is a big question. As if there is a heavy pressure of unknown quarters either from inside and out side our country, ignoring the basic premise for biotech regulation, to pass this bill. Anybody can assume that this is nothing but a “scientific tyranny “or a terrorism of unsocial science regulated by some MNCs and favoured by few political bosses of today’s central Govt.

Biotechnology Regulatory Authority Bill (BRAB) of 2009 drafted by the department of bio-technology under the Ministry of Science and Technology. It extends to the whole of India.

But if anybody goes through this BRAI bill, he/she can well understand that this is nothing but a sugar coated poisonous tablet. Cunningly the GM nexus is working against the sustainability of the human race and for mass extermination of human population and the nature. Even the proposed Bill does not have any provision to punish corporate house and/or people who conceal information of adverse effects of genetically modified organisms and food. Planning Commission’s Task Force on Biodiversity and Genetically Modified Organisms (GMOs) for the 11th Plan says the problem with this regulatory system is that “it lacks technical competence, transparency and stringency” and this new Bill does nothing to set right these shortcomings. Even environment minister Jairam Ramesh also opposed the idea of setting up a biotech regulatory under the proposed bill calling it “deeply flawed” and “anti-democratic”. Anybody can say -it is evident that this is a game by MNCs and the notorious caucus group only to control the world by controlling the entire food chain and patent all life forms, so as to help them consolidate their position and have dominance.

This authority is three member weak body with short term of 3 years and reappointment provision.

There will be representation of State Governments, any farmers representation, consumers or public interest groups. There will be No bar on subsequent employment of these members [like the Human Rights commission].

The Advisory body of this authority and scientific bodies can have endless members from PRIVATE sector. In-fact all members can be from Private Companies.

Section 61 and 62 so drafted that – Nobody can ever be penalized for any violations. Again Chapter 13 section 63 of the draft bill says, “Whoever, without any evidence or scientific record misleads the public about the safety of the organisms and products…shall be punished with imprisonment for a term that shall not be less than six months but which may extend to one year and with fine which may extend to two lakh rupees or with both.There is also no provision for penalty for concealment of information and for concealment or misrepresentation about safety of GE products. No Offences are cognizable in this draft. In a Nut Shell – No body would ever be punished for pushing the human race to death, disease and devastation.

The layout and provisions of the structure clearly shows that BRAI is not going to be a regulatory authority but an approval agency. It is equally undemocratic and violative of our Constitution that states have been kept out of the regulatory process although agriculture and health, for that matter - is a state subject.[ as in Article 246 of Constitution LIST II of 7 th Schedule Item 14: Agriculture, including agricultural education and research, protection against pests and prevention of plant diseases.]

Seriously it is so unconstitutional that - Section 2of this draft says- It is hereby declared that it is expedient in the public interest that the Union should take under its control the regulation of organisms, products and processes of modern biotechnology industry. That means It will override all laws made by the STATE Government and will gain exclusive control over item specified in list II of VII th Schedule without actually going in for an amendment. Also it will encroach into Environment Protection Act1986.

Finally you can’t get any information about all these through right to information act. What a fascist idea.

When these GM products will be marketed there will be no Post-marketing surveillance and monitoring of these products with proven evidences of their harmful effects of these products – nobody will be held responsible for that, nobody can recall the product, and nobody can revoke the approval of these products also. Where is the regulation and where is the regulatory body then? By all these analysis one can say that this Biotechnology Regulatory Authority of India Bill is an assessment of how we all Bharatiyas (and all our future generations) are being put up as bonded. The ultimate result by implementing this bill will be-The MNCs will get royalty and commission every time you feel hungry and every bite of food you take. The diseases caused by the GE products would be treated only by the GE medicines they will have. So by adopting this bill we will be pushed towards a permanent slavery and disaster. The bottom line of our national agricultural biotechnology policy should be the economic well-being of farm families, food security of the nation, health security of the consumer, protection of the environment and the security of our national and international trade in farm commodities, out of which no purpose will be fulfilled by this bill.

This biotech bill will misguide the country by a decision of only 3 technocrats, make approval of unsafe GM food; overrule the citizen’s right to know, kill the consumer right to choose by refusing labeling and pushing the country into a treadmill of GM foods and jeopardise food security and sovereignty.

So Bharatiya Kisan Sangha Prabandha Samiti appeals to all the MPs and the people to oppose this antinational draconian BRAI bill inside and outside the parliament respectively and to all the state governments to oppose this bill to restore their constitutional rights.

Finally BHARATIYA KISHAN SANHGA proposes to our central Govt. to scrap this BRAI Bill totally and bring a judicious Biotech Safety Authority Bill in it’s place for the betterment of our vast population or else for restoring our nations fundamental rights, freedom of speech, human right provisions, democracy and sovereignty of our country Bharatiya Kisan Sangha will agitate to any extent as when and where it will think and feel appropriate.

अ. भा. प्रतिनिधि सभा, सिरातोपु तिरूच्चिरापल्ली में पारित प्रस्ताव, दिनांक 19,20,21, फरवरी 2010

Filed under: Resolutions — Office @ 7:21 am

प्रस्ताव क्र. 1

‘‘मनरेगा को कृषि एवं अन्य कृषि कार्य से जोड़ा जाय ’’

कौन बनाता हिन्दुस्थान ! भारत का मजदूर किसान !!

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ कुल आबादी का लगभग 54.4% अर्थात 162038800 हेक्टेयर भूमि में खेती होती है। खेती में प्रति वर्ष औसतन प्रति हेक्टेयर 100 मजदूर की आवश्यकता होती है। परन्तु पिछले दो वर्षों में खेती में काम करने वाले व्यक्तियों के अभाव में केवल 12.2 करोड़ हेक्टेयर में ही खेती हुई है। अर्थात लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि में मजदूर के अभाव में खेती नही हो पाई है। जिसका खाद्यान्न उत्पादन पर विपरीत असर पड़ा है। देष का फसल उत्पादन घट गया है। जिसके कारण देश की खाद्यान्न सुरक्षा पर असर पड़ा है। एक तरफ खेती कार्य में किसान मजदूर का अभाव तथा दूसरी तरफ नियोजित ढ़ंग से लगभग 4.49 करोड़ किसान मजदूर को खेती से हटाकर ‘मनरेगा’ के माध्यम से दूसरे गैर कृषि कार्यो में लगाये जाने के कारण देश में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है।

भारतीय किसान संघ का मानना है कि किसान-मजदूर दोनों अलग नही परन्तु एक ही है। एक दूसरे के पूरक हैं। एक सिक्के के दो पहलु हैं। देश के किसान-मजदूर को वर्ष भर का काम मिलना ही चहिए और यह खेती में ही संभव है। इसलिए मनरेगा को खेती से जोड़ा जाय।

अतः भारतीय किसान संघ की प्रतिनिधि सभा भारत सरकार से मांग करती है कि ‘मनरेगा’ को कृषि और कृषि से संबधित अन्य कार्यों से जोड़ा जाय। जिन दिनों में खेती में कार्य की अधिकता रहती है उनदिनों में गाँव में मनरेगा के अन्र्तगत अन्य कार्य न लिया जाये। जिससे खेती के लिए खेत में काम करने वाले मिलेगें। खेती में कार्य करने वाले लोगों के कार्य दिवस में वृद्धि होगी और उनकी आय बढ़ेगी। किसान और खेत मजदूर दोनों के संतुलित सहभागिता के आधार पर राष्ट्र विकास की चरम ऊंचाई को स्पर्श कर सकेगा।

‘भारत माता की जय’

प्रस्ताव क्र. 2

वैश्विक पर्यावरण के न्याय संगत व्यवस्था के लिए भारत दृढ़ता से खडा रहे।

विश्व आज एक भयावह संकट की तरफ बढ़ रहा है। उपभोक्तावाद व तथाकथित मुक्त बाजार ने प्रकृति के संतुलन को इस सीमा तक बिगाड़ दिया है कि मौसम में परिवर्तन अब केवल बौद्धिक विमर्श का विषय नहीं रह गया हैं। न केवल पृथ्वी वरन अंतरिक्ष तथा समुद्र की गहराईयों तक पर्यावरण का असंतुलन दिखाई पड़ रहा है। समृद्धि के बढ़ते स्तर, मिस्खलनों का फिसलना, ओजोन परत का क्षीण होना, वनक्षेत्र तथा जैव विविधता में निरंतर कमी जैसी अनेक परिघटनायें सम्पूर्ण मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है। मौसम में बदलाव का प्रत्यक्ष प्रभाव फसलों के उत्पादन स्तर पर भी पड़ा है। बढ़ते तापमान के कारण अनाज व दलहन का उत्पादन घट रहा है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि, प्रति डिग्री तापमान बढ़ने के साथ गेहूं के उत्पादन स्तर मेंएक निश्चित गिरावट ही रही है।

इसलिए यह कदापि आश्चर्य का विषय नहीं है कि मौसम का बदलाव आज एक वैश्विक एजेंडा बन गया है। यह सर्वथा उचित ही था कि 192 देशों के राष्ट्र मानवजाति व सम्पूर्ण पृथ्वी के भविष्य पर चर्चा करने के लिए कोपेनहेगन में एकत्र हुए। परन्तु शीघ्र ही यह स्पष्ट होने लगा कि उंचे स्वर से की जाने वाली खोखली घोषणाओं के पीछे कोपेन हेगन में कुछ निहित स्वार्थी ऐसी सौदेबाजी में जुटे हैं जिससे वर्तमान अन्यायपूर्ण व्यवस्था जारी रहे तथा उन पर कोई वैज्ञानिक लगाम न कसी जा सके। ये वे ही राष्ट्र हैं जिन पर खिलवाड़ करने का सर्वधिक दोष तथा उसकी क्षतिपूर्ती का उत्तरदायित्व है।

कोपेनहेगन शिखर वार्ता की समाप्ति के बाद यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो गया है कि न केवल इस वार्ता से पर्यावरण के संकट से संबंधित किसी महत्वपूर्ण मुद्दे का समाधान नही निकल सका है, वरन इसने 11 दिसम्बर 1996 के क्योटो प्रोटोकॉल को भी अप्रासंगिक का दिया है। 16 फरवरी 2005 से प्रभावी हुए क्योटी प्रोटोकॉल के अंतर्गत 37 ओद्योगिक राष्ट्रों ने चार ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, नाइट्रेट, सलफर हेक्सा हेक्सा क्लोराइड) के उत्सर्जन स्तर में कमी लाने का संकल्प लिया था। इन राष्ट्रों ने उत्सर्जन स्तर में 5 प्रतिशत तक की कटौती की बात स्वीकार की थी। परन्तु कोपेनहेगन समझौते में बाद दो प्रतिशत कटौती की बात कही गई है। उत्सर्जन स्तर में कटौती का मुख्य उत्तरदायित्व अमेरिका, चीन व यूरोप पर है। अकेले अमेरिका व चीन विष्व के 50 प्रतिशत उत्सर्जन (प्रदूषण) के लिए जिम्मेदार हैं। भारत मात्र चार प्रतिशत ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन करता है। लेकिन भारत सरकार ने कोपेन हेगन वार्ता के दौरान स्वयं को चीन के साथ जोड़कर अपनी भूमिका को संदिग्ध बना लिया है।

वर्तमान विश्व परिदृश्य कोपेनहेगन में एक न्याय संगत, वैधानिक अनिवार्यता वाले समझौते की योजना करता था। परन्तु विश्व ने वहां भविष्य की चिंता के प्रति पूर्णताः संवेदनहीन आरोप-प्रत्यारोप का घिनौना खेल देखा। धनी व तथाकथित विकसित राष्ट्रों ने अपने उत्सर्जन स्तर में किसी भी प्रकार की कमी लाने की प्रतिबध्दता व्यक्त करने से इंकार कर दिया। इन राष्ट्रों का अटूट विश्वास अभी भी एक ऐसी बाजार संचालित अर्थव्यवस्था पर है, जो निधि उपयोग पर आधारित होने के कारण प्राकृतिक संसाधानों को तेजी से निगल रही है। इस जीवन पद्धति के परिणामस्वरूप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण हुआ है जहां विश्व की लगभग 16 प्रतिशत आबादी कुल ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन का आधा उत्सर्जन कर रही है। एक अध्यायन के अनुसार बीसवीं सदी के 0.7 फारनहाइट से 1. द.फा. की तुलना में इक्कीसवी सदी में तापमान वृद्धि 2.5 फा. से 10. फा. तक होने की आशंका है। परन्तु दुर्भाग्यवश भारत सरकार न केवल कोपेनहेगन में कोई भी मुद्दा कारगर ढंग से उठाने में असफल रही बल्कि हुए उसने अपने पक्ष को पहले की अपेक्षा भी कमजोर किया। विश्व में सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले देश चीन के साथ स्वयं को खड़ा करके भारत कने अन्य विकासशिल राष्ट्रों का विश्वास भी खोया है। चीन सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार चीन के खेतों से निकलने वाले प्रदूषण का स्तर वहां के कारखानों व उद्यमों के बराबर हो गया है। ‘‘राष्ट्रीय प्रदूषण गणना’’ इस रिपोर्ट में कहा गया है कि रासायनिक खादों व कीटनाशकों के बेतहाशा उपयोग के प्रदूषण स्तर को भयानक बना दिया है। चीन का किसान आज आवश्यकता से 40 प्रतिशत अधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहा है।

भारतीय किसान संघ की यह अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का मत है कि आज हम राष्ट्रों के भविष्य तथा मानव सभ्यता की दृष्टि से एक चैराहे पर खड़े हैं।

अतः यह प्रतिनिधि सभा भारत सरकार से मांग करती है कि वह इस समस्या के सभी पहलुओं पर नये सिरे से विचार करे। पश्चात्य केन्द्रित, व्यक्तिवादी व उपभोक्तावादी विष्व दृष्टि वर्तमान पर्यावरण संकट के मूल में है। ‘त्येन-त्यकतेन भुंजिथा’ पर आधारित समग्र जीवन दृष्टि में ही इस समस्या का समाधान है। प्रतिनिधि सभा का दृढ़ मत है कि प्राकृतिक संसाधनों के सर्वाधिक निकट रहने वाले जन ही उनके प्रबंधन व संवर्धन का सर्वाधिक ज्ञान रखते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरन के साथ-साथ अक्षय विकास मॉडल के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग संभव होगा। इस दृष्टि से ग्राम पंचायतों सहित सभी स्थानीय निकायों की भूमिका का पुनर्निधारण किया जाना चाहिए।

अ.भा.प्र.स. भारत सरकार का आह्वान करती है कि वह चीन सहित सभी धनी राष्ट्रों के कुत्सित प्रयासों के विरुद्ध दृढता से खड़ी रहे। हम यह भी मांग करते हैं कि सभी नये अध्ययनों तथा महत्वपूर्ण दिशा परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए एक समग्र नीति परिवर्तन दस्तावेज सरकार द्वारा तैयार किया जाना चाहिए।

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा देश के किसानों का आह्वान करती है कि वे सारे, स्वास्थवर्धक व अक्षय विकास पर आधारित अपने पारम्परिक ज्ञान व जीवन शैली पर विश्वास बनाए रखें। आत्म संहार की इस अंधेरी सुरंग में भारत के गाँव ही प्रकाश की एक मात्र किरण हैं। गो-केन्द्रित, जैविक कृषि आधारित संतुलित जीवन पद्धति में वर्तमान युग की अनेक चुनौतियों का हल निहित है।

Speech of Hon. Gen Secy

Filed under: News : नवीन समाचार, Resolutions — admin @ 2:03 pm

SPEECH OF HON. GENERAL SECRATARY OF BHARATIYA KISAN SANGH Shri Babasaheb Takvale AT JODHPUR given during the Akhil Bharatiya Paratinidhi Sabha

(more…)

Jodhpur Resolution

Filed under: News : नवीन समाचार, Resolutions — admin @ 1:59 pm

Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha

Akram Vidynani Dada Bhagwan Swa-Sanskar Kendra,
Tinwari, Jodhpur
Ugabdha 5110, Phalgun Shudha 2, 3/4,5 Vikram Samvat 2065
Date 27, 28 February , 1 March 2009

Resolution No. 1

Cow-based self reliant organic farming

Resolution No.2

Food security be ensured.

Resolution No.3

Bhagawan Balram jayanti be declared a ‘Farmers Day’.

Resolution No.4

Agriculture and Village based sustainable economy is only alternative.

(more…)

Address : Bharatiya Kisan Sangh : 43 Deendayal Upadhyaya Marg New Delhi - 110002 Tel.: 011-23210048