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जोधपुर में 13 सितम्बर की किसान अधिकार रैली की पूर्व तयारी बैठक

स्रोत: BKS-HND      तारीख: 28 Aug 2013 19:04:17

$img_titleजोधपुर, अगस्त 29 : 13 सितम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान मे आयोजित किसान अघिकार रैली की पूर्व तैयारी के लिए, 25 अगस्त 2013 को आदर्श विद्या मन्दिर लालसागर जोधपुर में भारतीय किसान संघ जोधपुर प्रांत (पश्‍चिमी राजस्थान) की बैठक हुई।

राष्ट्रीय जैविक प्रमुख रतनलाल डागा ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधन करते हुए कहा - कोई भी सामान्य व्यक्ति देश की सरकार के द्वारा किसानों के प्रति किये जा रहे व्यवहार से यही निष्कर्ष निकालेगा कि भारत सरकार यहॉ के किसानों के विरुद्ध और विदेशी किसानों एवं कम्पनियों की पक्षधर बन कर आचरण कर रही है। आजादी के समय देश की सकल आय में कृषि का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक था जो अब घटकर 15 प्रतिशत से नीचे आ चुका है, यह स्पष्ट करता है कि सरकारी नीतियॉ कृषि के सम्बन्ध में दोषपूर्ण है। उस समय 80 प्रतिशत से अधिक कृषि क्षेत्र से रोजगार मिल रहा था और अब 66 प्रतिशत खेती पर निर्भर है। कृषि पर निर्भरता कम होती जा रही है।

सरकार की नीतियां और कार्यपद्धति ऐसी है कि वह खेती और किसान को नष्ट करना चाहती है। सरकार किसानों के विरुद्ध युद्ध घोषित कर चुकी है, जिसके अन्तर्गत किसानों के विरुद्ध किसान विरोधी बीज कानून, रासायनिक खाद-डीजल-पेट्रोल के मूल्य बढाकर किसानों की पहुंच से बाहर कर देना, उपज का लाभकारी मूल्य नही देना, जानबूझकर कृषि उपज की खरीद और भण्डारण व्यवस्था नहीं करना, दोषपूर्ण आयात-निर्यात नीति, कृषि क्षेत्र में शत प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश, फुटकर व्यापार में विदेशी कम्पनियों को आमंत्रित करना, चोर दरवाजे से द्विपक्षीय मुक्त व्यापारिक अनुबन्धों के द्वारा स्थानीय कृषि के साथ कुठाराघात करना और अन्त में ‘जेनेटिक फूड’ के पक्ष में वकालत करना आदि किसान एवं कृषि को समाप्त करने वाली घातक नीतियां अपनाकर सरकार किसानों पर चौतरफा आक्रमण कर रही है। सरकार के द्वारा घोषित किसान विरोधी नीति के कारण पिछले दशक में 2,90,000 किसान आत्महत्या कर चुके, और 42 प्रतिशत किसान कृषि छोड़ने को तैयार बैठे हैं। नया बीज कानून लागू करके किसानों के हाथ से बीज छीन कर, विदेशी कम्पनियों को बीज व्यापार करने के अधिकार देना चाहती है।

आज देश में किसान हित में कोई ऊर्जा नीति नही है, ऊर्जा के नाम पर सरकार करोड़ों रुपया विदेशी कम्पनियों को अवश्य दे रही है। किसानों के बैक खातों में सीधे ही अनुदान जमा कराने की सरकारी घोषणाएं दिखावा मात्र है। ब्याज मुक्त ॠण प्राप्त करना किसानों के लिए सपने की बातें हो चुकी। हर किसान, हर पशु, हर खेत एवं हर फसल का बीमा लाभ प्राप्त करना भी काल्पनिक होकर रह गया है। इससे सिद्ध होता है कि वर्तमान बीमा नीति के द्वारा भी सरकार यही चाहती है कि किसान और खेती नष्ट हो जावें। खेत को इकाई मानकर मौसम बीमा के स्थान पर फसल बीमा होना चाहिए क्यों कि पर्यावरण स्थिति सभी स्थान पर समान नही होती है।

वर्तमान वैश्‍विक परिदृश्य और बदलते परिवेश में किसान सामान्य रूप से छोटी और कमजोर कड़ी है। विभिन्न तरीकों, ठेकेदारी और बंधुआ खेती के माध्यम से आसानी से जिसका शोषण किया जा सकता है। हम किसानों को एकजुट रहने और उन्हें अपनी मांगों या शिकायतों को संबंधित विभागों या सरकार के समक्ष न्याय प्राप्त करने हेतु लोकतांत्रिक तरीके अपनाने के लिए तैयार रहना होगा। किसान एकजुट होकर बेहतर तरीके से अपने मुद्दों को उठा सकते हैं।

इसी बैठक में प्रदेश अध्यक्ष मणीलाल लबाणा ने बताया कि किसानो को भूमि का मालिकाना हक मिले जिसके लिए भूमि अधिग्रहण विधेयक की बजाय भूमि उपयोग विधेयक होना चाहिए, जिसें भूमि बैंक और भूमि वापसी बैंक की नीति से सशक्त बनाया जाये। सरकार को जिला स्तर पर भूमि बैंक खोलना चाहिए और किसान के अंतिम सहारे के रूप में मौजूद कृषि भूमि को लीज पर लिया जाना चाहिए और भूमि अधिग्रहण समझौते के तहत कृषि भूमि को उपयोग में नहीं लाया गया है तो ऐसी भूमि किसान को वापस किया जाना चाहिए। भूमि से खनिज सम्पदा प्राप्त होने पर उसकी रॉयल्टी भू-स्वामी किसान को भी प्राप्त हो तथा कृषि योग्य भूमि को कृषि कार्यो के लिए ही सुरक्षित किया जाये। देश को इस बात को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। एक्सप्रेस वे पर औद्योगिक घराने का विस्तार, न्यू टाउनशिप, नये उद्योग, विशेष आर्थिक जोन और अन्य मिलती जुलती गतिविधियां केवल सस्ती भूमि की अतिरिक्त मांग को बढ़ाती है जिसके लिए किसानों की उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण होता है।

कृषि की अनदेखी, जो अभी भी सकल घरेलू उत्पाद का 20 प्रतिशत है, यह बतलाती है कि यह असमानता का मुख्य कारक है। विश्‍व बैंक रिपोर्ट 2008 यह बतलाती है कि गरीबी दूर करने के लिए कृषि में 1 प्रतिशत का विकास उसी प्रकार के गैर कृषि विकास के तीन गुना से अधिक प्रभावी है। अब वह समय है जब हमें राष्ट्रीय भूमि नीति पर विचार करना चाहिए। ऐसी चर्चा की तो जाती है परन्तु जब नीतिगत निर्णय की बात आती है तो सरकार या तो मसखरा करती है या कार्पोरेट दबाव के समक्ष घुटने टेक देती है। सरकार जल स्रोतों के निजिकरण की योजना बनाकर किसानों को जिन्दा ही मारना चाहती हैं।

प्रान्त अध्यक्ष हीरा लाल चौधरी ने सरकार की किसान विरोधी नीतियों से, किसान बैंक, सेठ साहुकार एवं सामन्तवादी ताकतो का आर्थिक रूप से गुलाम हो गया है परिणामस्वरूप किसानो की जमीन नीलाम हो रही है। इसका मुख्य कारण लागत आधारित लाभकारी मूल्य नही मिलना है। 

अप्रैल 2010 से फास्फेट युक्त खादों की दरें 900 रुपये से बढकर 2400 रुपये प्रति क्विंटल, पोटास खादों की दर 450 रुपये से बढकर 1700 रुपये प्रति क्विंटल हो चुकी है। सरकार ने डीजल की दरें 50 पैसे प्रतिमाह बढानें की प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। कृषि लागतों में 20 प्रतिशत हिस्सा डीजल का होनें के बावजूद इन आदानों की कीमत वृद्धि के अनुपात में कृषि उत्पादों की भी दरें बढनी चाहिए, यह सोचनें वाला कोई नहीं है। कृषि लागत एवं मूल्य निर्धारण आयोग उक्त कारणों से धान का मूल्य बढ़ाने की अनुशंषा करता है तो उपभोक्ता मंत्रालय उसका विरोध करता है और दूसरी ओर वही कृषि लागत एवं मूल्य निर्धारण आयोग गेहूँ के वर्तमान मूल्य को पर्याप्त बतानें की कोशिश करता है। गत 4 वर्षो से साधारण धान से लेकर कपास तक के निर्यात बार-बार प्रतिबंधित किया गया है और सरकार अमेरिका से गेहूँ एवं मक्का आयात करके विदेशी किसानों/कम्पनियों के हित में काम कर रही है। यह सब देख कर लगता है कि केन्द्र सरकार किसानों को खेती बन्द करने का नोटिस दे रही है, दूसरी ओर किसान की समझ से परे है कि इन परिस्थितियों में वह कैसे खेती करके स्वयं की आजीविका चलाये और कैसे देश के भण्डार भरे।

अब परिस्थितियॉं किसानों के बर्दास्त से बाहर हो रही हैं और इसके लिए मजबूर होकर आन्दोलन की राह पर चलना होगा जिसकी शुरूवात करने के लिए किसानों को एकजुट होकर किसान अधिकार रैली में अधिक से अधिक संख्यॉं में भाग लेकर आर्थिक आजादी का शंखनाद करना हैं।

बैठक में प्रदेश उपाध्यक्ष माणकराम परिहार बताया कि ‘मनरेगा’ योजना में भ्रष्टाचार व कामचोरी के कारण मजदूरों में विकृतियॉं बढ रही हैं इसके कारण खेती के लिए मजदूरों की भारी किल्लत हो गई है जिससे खेती करना मुश्किल हो गया हैं।

बैठक में प्रदेश अधिकारी गणपत चौधरी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली में बिना परीक्षा दिये उत्तीर्ण करने की व्यवस्था पर चिंता जताई, सरकार की योजना विद्यार्थीयों की शिक्षा की नींव कमजोर करके गर्त में धकेलने की रही है।

प्रान्त महामंत्री दलाराम बटेसर ने रैली की रणनीति बताई कि जोधपुर प्रांत (पश्‍चिमी राजस्थान)की सभी 104 तहसीलों की प्रत्येक ग्राम इकाई में वाहन रैली, दिवार लेखन, निमंत्रण पत्र, पीले चावल द्वारा किसान अधिकार रैली के प्रति जन-जागरण करना है।

बैठक में प्रदेश संगठन मंत्री कृष्ण मुरारी, धनसुख टरू, सोमाराम, चिमनाराम समेत जोधपुर प्रान्त के सभी तहसीलों के पदाधिकारी उपस्थित थे।

अन्त में जिला अध्यक्ष नरेश व्यास ने धन्यवाद ज्ञापित किया। बैठक का संचालन जिला महामंत्री तुलछाराम और पाली विभाग संगठन मंत्री पुष्कर राज ने किया।

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