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भूमि अधिग्रहण अध्यादेश : भाकिसंघ की भूमिका

स्रोत: BKS-HND      तारीख: 14 May 2015 16:08:14

गत 31 दिसंबर 2014 को केंद्र सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने के लिए अध्यादेश लाया और तबसे पूरे देश में इस पर बवाल मचा हुआ है। सरकार एवं विपक्ष दोनों भी इस संदर्भ में अनेक तर्क-वितर्क दे रहे हैं। दोनों भी स्वयं को किसान हितैषी बताकर अध्यादेश का समर्थन कर रही है या उसका विरोध कर रही है। इसके कारण समाज में खासकर किसानों में असमंजस का वातावरण पूरे देशभर में है।

भूमि अधिग्रहण के मामले में अपने देश में 10-12 साल से बहुत चर्चा चल रही है। क्योंकि जमीन अब अधिक मूल्यवान बन चुकी है। वैसे अंग्रेजों के राज में 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून अंग्रेजों ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए बनाया था। इस कानून से सरकार को अमर्यादित अधिकार दिए गए थे। कौन-सी भूमि लेना, किस कारण से लेना, कितने समय में लेना, उसकी कीमत तय करना इन सबका निर्णय सरकार ले सकती थी। इतना ही नहीं आपको न्यायालय में जाने का रास्ता भी सरकार के हाथ में था। इतना अन्यायकारी, अपारदर्शी कानून अंग्रेज जाने के बाद भी अपने देश में चल रहा था। समय-समय पर इसमें मामूली संशोधन होते रहे। किंतु मूल भाव वही रहा।

जैसे-जैसे लोगों के ध्यान में यह आने लगा कि इस कानून की आड़ में उद्योगपति, अमीर लोग राजनेता एवं सरकारी तंत्र के साथ साठगांठ करके जमीन कम दाम पर हथियाकर उसको फिर ऊंचे दाम पर बेचते हैं तो उसके बारे में प्रतिक्रिया, विरोध, आंदोलन प्रारंभ हो गए। जिसमें बंगाल में सिंगूर, उत्तर प्रदेश में भट्टा परसौल, महाराष्ट्र में मावल आदि स्थानों पर बड़े आंदोलन हुए। वहां सरकार ने दमनकारी नीति अपनाई। हिंसा हुई, पर जनता झुकी नहीं। सरकार को अधिग्रहण की सूचना वापस लेनी पड़ी। और इसी पृष्ठभूमि पर 1894 के कानून को रद्द करके नए कानून लाने की चर्चा देशभर में प्रारंभ हो गई।

1894 के काले अपारदर्शी, अन्यायकारी कानून के स्थान पर पारदर्शी एवं जमीन मालिक को सही मुआवजा मिले, उसका जीवन-यापन अच्छी तरह से चले, इन विषयों पर नए कानून में विचार हो, यह बात प्रमुखता से सामने आई। साथ में ही बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर खाद्यान्न सुरक्षा का भी विचार हो, यह बात भी प्रबलता से सामने आई। उस समय के सत्तापक्ष, विपक्ष, सामाजिक संगठन, किसान संगठन इन सबने इसका समर्थन किया। संसद की स्थायी समिति में इस पर लंबी चर्चा हुई। समाज के सभी लोगों की राय लेकर विचार-विमर्श करके नए कानून का प्रारूप बना।

इस कानून में मुख्य रूप से जिन बातों का विचार किया गया था, वह इस प्रकार की थी।

1.जिसकी जमीन ली जा रही है उसकी उसमें सहमति हो। निजी के लिए 80% सरकारी के लिए 70% सहमति आवश्यक की गई।

2.जमीन मालिक को पर्याप्त मुआवजा देने का प्रावधान।

3.जमीन अधिग्रहण होते समय उसका असर केवल जमीन मालिक पर ही नहीं तो वहां उसके आधार पर आजीविका चलाने वालों पर भी पड़ता है। इसको ध्यान में लेकर उस प्रकल्प का सामाजिक प्रभाव के अध्ययन का प्रावधान किया गया।

4.खाद्यान्न सुरक्षा के मद्देनजर उपजाऊ जमीन (एक या बहुफसली) का अधिग्रहण अंतिम पर्याय के रूप में करने का प्रावधान।

5.5 साल में जमीन का उपयोग नहीं होता है तो जमीन वापस करने का प्रावधान।

6.सरकारी अधिकारी अगर अन्याय करता है तो उसके खिलाफ कोर्ट में जाने की अनुमति।

इसके अलावा 13 अलग प्रकार के कानून समय-समय पर सरकार ने बनाए थे। जैसे, रक्षा विभाग, मेट्रो आदि 2013 के कानून में शामिल नहीं थे। किंतु 2013 के कानून पारित होने के बाद एक साल के अंदर 2013 के कानून के मुआवजे के प्रावधान के दायरे में इन 13 कानूनों को लाना इसका प्रावधान था।

2013 का कानून बनाते समय कुछ बातों को ज्यादा ही खींचा गया था। जैसे 80% सहमति का प्रावधान या सामाजिक प्रभाव के अध्ययन की प्रक्रिया को जटिल बनाया गया था। इस संदर्भ में संशोधन करने की आवश्यकता सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने नई केंद्र सरकार के सामने रखी थी।

इसी को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने यह अध्यादेश लाया। सरकार द्वारा जो संशोधन अध्यादेश लाए गए थे, वह निम्न प्रकार थे।

1. इस अध्यादेश द्वारा सरकार ने भूमि अधिग्रहण को 5 वर्गवारी की। रक्षा, ग्रामीण संरचनाएं, ढांचागत संरचनाएं, गरीबों के लिए आवास और औद्योगिक गलियारा इन सभी को सामाजिक प्रभाव के अध्ययन एवं सहमति के प्रावधान से छूट दे दी। यह करने से व्यावहारिक रूप से किसी भी प्रकार के अधिग्रहण को उपरोक्त दोनों प्रावधानों से छूट मिली। जो कि पारदर्शिता एवं सामाजिक न्याय के विपरीत था। इसमें किसान संघ का यह कहना है कि औद्योगिक गलियारे को जो छूट मिली है वह योग्य नहीं है। और औद्योगिक गलियारा की व्याख्या होनी चाहिए।

2.अध्यादेश के द्वारा निजी शिक्षा संस्थान एवं अस्पतालों के लिए भूमि अधिग्रहित करने का प्रावधान।

3.उपजाऊ भूमि न लेने के मामले का उल्लेख नहीं है।

4.कसूरवार अधिकारी के खिलाफ सरकार की अनुमति बगैर न्यायालय नहीं जा सकेंगे।

5.जमीन का उपयोग 5 साल में नहीं होता है तो वापस करने के प्रावधान में बदलाव करके 10 साल या प्रकल्प के हेतु पर निर्भर करना।

इस प्रकार के संशोधनों के कारण 2013 के कानून में ढांचागत परिवर्तन हो गया। जिसके कारण पूरे देश में असंतोष का वातावरण निर्माण हुआ। भारतीय किसान संघ ने अध्यादेश पर अपनी असहमति जताते हुए विरोध किया और इसमें सुधार करने की मांग की।

भा.कि.संघ की ओर से जो बातें रखी गई थी वह इस प्रकार से थी।

1.2013 के कानून को तर्कसंगत बनाना।

2.रक्षा विभाग, सिंचाई जैसी आधारभूत संरचनाएं ग्रामीण क्षेत्र में ढांचागत संरचनाएं, सड़कें, रेलवे आदि के लिए भूमि अधिग्रहण को सहमति के प्रावधान से छूट दे सकते हैं। किंतु रक्षा विभाग के अलावा अन्य भूमि अधिग्रहण को सामाजिक प्रभाव के अध्ययन से छूट न मिले। 13 कानूनों को 2013 के कानून के दायरे में लाना।

3.बंजर भूमि सरकार द्वारा अभी तक अधिग्रहित भूमि का प्रथम उपयोग हो। उपजाऊ भूमि (एक या बहुफसली) का अधिग्रहण अंतिम पर्याय में हो।

4.किसान को जमीन भाड़े-पट्टे पर देने का पर्याय रहे।

5.भूमि उपयोग हेतु में परिवर्तन होने के बाद भू-स्वामी को फायदे में हिस्सा मिले।

6.निजी उद्योग, निजी अस्पताल एवं शिक्षा संस्थानों के लिए सरकार भूमि का अधिग्रहण न करे।

7.औद्योगिक गलियारों की सीमा निश्चित करें।

8.किसानों की सहमति 80% के स्थान पर 60% हो सकती है।

8.सामाजिक प्रभाव का अध्ययन होना चाहिए।

इन सब विषयों को लेकर किसान संघ की सरकार एवं भाजपा के साथ चर्चा हुई। इन वार्ताओं के कारण सरकार ने अध्यादेश में कुछ सुधार किए वह स्वागत योग्य है। जो इस प्रकार से है।

1.औद्योगिक गलियारे की व्याख्या करके सड़क एवं रेल के दोनों तरफ 1-1 किलोमीटर तक किया गया।

2.बड़े निजी प्रकल्प एवं निजी अस्पताल व निजी शिक्षा संस्थानों के लिए सरकार भूमि अधिग्रहित नहीं करेगी।

3.बंजर भूमि एवं सरकार के पास की अधिग्रहित भूमि का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा।

4.प्रकल्प के लिए जितनी अति आवश्यक है, उतना ही अधिग्रहण होगा।

5.मजदूर के परिवार में नौकरी की सुनिश्चितता की गई।

6.कसूरवार अधिकारी के खिलाफ कोर्ट में जाने की अनुमति दी गई।

किंतु इन संशोधनों के बावजूद किसान संघ का कहना है कि सरकार को सही मायने में इस कानून को किसान एवं देश हितैषी बनाना है तो निम्नलिखित संशोधन करने चाहिए।

1.खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून में उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण, यह अंतिम पर्याय रहेगा, इसका स्पष्ट उल्लेख हो।

2.सामाजिक प्रभाव का अध्ययन रक्षा के मामले को छोड़कर सभी अधिग्रहण के लिए सरलता तथा तय समय सीमा में हो।

3.किसान को भूमि पट्टे पर देने का पर्याय रहे।

4.60% किसान की सहमति हो।

5.भूमि का उपयोग बदलने के समय भूस्वामियों को मुनाफे में हिस्सा मिले।

6.जमीन का उपयोग 5 साल में न होने पर मालिकों को वापस कर दी जाए।

इन बातों को लेकर सरकार के साथ अपनी वार्ता चल रही है। आशा है कि सरकार इन बातों को मान लेगी।

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